Posted on 27 September 2010 by ajayjha
आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) ने शुक्रवार को राष्ट्रीय उपभोक्ता सहकारी महासंघ (एनसीसीएफ) को तिलहन और दलहन की खरीद के लिए नामांकन की मंजूरी दे दी. इसके बाद सारी अटकलें टूट गईं.
विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार नैफेड कृषि उत्पादन की खरीद पर अपने एकाधिकार समाप्त करने के मुद्दे पर सरकार से लड़ने की योजना बना रहा है.
सरकार ने अपनी ओर से नेफेड को स्पष्ट संकेत दे दिया है कि इस काम के लिए कई एजेंसियों हैं. कई लोग इसे सरकार और नेफेड के बीच बेल आउट मुद्दे पर मौजूद दूरी के विस्तार के रूप में देखते है.
पाठकों पता होगा कि सरकार ने नेफेड के बेल-आउट पैकेज पर रोक लगा दी जब तक नैफेड अपना बाइ-ला में संशोधन नहीं कर लेता और अन्य शर्तें स्वीकार नहीं कर लेता.
नैफेड 30 से अधिक वर्षों से तिलहन और दलहन की खरीद में एकाधिकार रखता था. 2 या 3 बार को छोड़ इसने हमेशा सरकार के लिए घाटे पर व्यापार किया है. सूत्रों के अनुसार सरकार का यह कहना है कि हम अन्य एजेंसियों को आजमाएं और देखें कि क्या वे सरकार के लिए बेहतर परिणाम देती हैं.
सूत्रों के अनुसार नेफेड के अध्यक्ष विजेंद्र सिंह पर मंत्रालय के साथ विरोध दर्ज करने के लिए दबाव बनाया जा रहा है.
एनसीसीएफ एक राष्ट्रीय स्तर का उपभोक्ता सहकारी संगठन है जो उपभोक्ता सहकारिता और वितरण एजेंसियों के आपूर्ति-समर्थन में संलग्न है. पी.एस.एस. के तहत तिलहन और दलहन के खरीद के लिए एक एजेंसी के रूप में इसका नामांकन नेफेड के लिए हितकर नहीं है.
Posted on 27 September 2010 by ajayjha
नेफेड की 25 सितम्बर की वार्षिक आम बैठक तूफानी साबित हुई. एक दिन पहले शुक्रवार को सरकार ने कृषि उपज की खरीद पर नेफेड के एकाधिकार को समाप्त करने की घोषणा की थी. कृषि उत्पाद पर नेफेड की पकड़ कमजोर करने के लिए दो नए खिलाडी- एनसीसीएफ और सीडब्ल्यूसी- सरकार की सूची में शामिल हो गए.
सरकार के कदम से नाखुश नेफेड की एजीएम ने अपना ध्यान एनसीसीएफ को दी गई भूमिका पर केन्द्रित रखा. नेताओं ने कहा कि सहकारी समितियों के बीच प्रतियोगिता नहीं हो सकती क्योंकि सहकारिता बुरे दौर से गुजर रही है.
उन्होंने बैठक में उपस्थिति एनसीसीएफ के अध्यक्ष बीरेंद्र सिंह की ओर इशारा किया. सौभाग्य से विशाल सिंह, एनसीसीएफ के उपाध्यक्ष, भी मौजूद थे. नेफेड के नेताओं ने कहा कि एजीएम में एनसीसीएफ का लगभग पूरा बोर्ड मौजूद था और वे इस मुद्दे पर उन लोगों से सुनना चाहते थे.
सूत्रों के अनुसार, बीरेंद्र सिंह बुरी तरह घिर गए थे. जिस प्रस्ताव को प्राप्त करने के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की थी उसे कैसे इनकार कर सकते हैं? नामांकन पाने के लिए उन्होंने सरकार को आवेदन दिया था और अब ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जहाँ सहकारिता एकता के नाम पर उन्हें नामांकन छोडने के लिए कहा जा रहा है.
स्थिति को अपने पक्ष मे करते हुए, उन्होंने कहा कि एनसीसीएफ नेफेड के साथ प्रतिस्पर्धा में नहीं है. नेफेड बोर्ड और एनसीसीएफ बोर्ड के बीच वैचारिक मतभेद नहीं है. लेकिन हम ऐसे क्षेत्रों में व्यापार करेंगे जहां नेफेड पारंपरिक रूप से सक्रिय नहीं रहा है, जैसे- पूर्वोत्तर राज्य, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश.
न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा दिया गया है और किसानों के बीच अधिक से अधिक उत्पादन के लिए एक बड़ी प्रतियोगिता चल रही है. वहाँ प्रत्येक एजेंसी के लिए काम की गुंजाइश है, बीरेंद्र सिंह ने कहा.
भारतीयसहकारिता.कॉम को पता चला है कि एनसीसीएफ के अध्यक्ष को सरकारी प्रस्ताव को ठुकराने का संकेत भेजा गया था. कहा जाता है की श्री बीरेंद्र सिंह ने दबाव में काम करने से दृढ़ता से इनकार कर दिया है.
उपभोक्ता सहकारिता के कृषि उत्पाद के क्षेत्र मे घुसपैठ के आरोप के जवाब में श्री बीरेंद्र सिंह ने भारतीयसहकारिता.कॉम को बताया कि नैफेड, एक कृषि सहकारिता, भी उपभोक्ता सामग्री के विभिन्न मदों वाले किट बेच रहा था. उन्होंने आगे पूछा कि कैसे नैफेड के स्टालों को राष्ट्रमंडल खेलों के विभिन्न स्थानों पर अनुमति दी जा रही है जबकि यह भी एक कृषि सहकारी संस्था है?
Posted on 23 September 2010 by ajayjha
कृषि सहकारी संस्था नैफेड बिना बोर्ड या सरकार की दिलचस्पी आकृष्ट किए अधर में इंतज़ार कर रहा है. बेल-आउट पैकेज दोनों पक्षों के लिए छलावा बना हुआ है - सरकार और नैफेड-बोर्ड अपने स्टैंड पर अडे हुए हैं.
नुकसान किसका है? वास्तव में न तो सरकार का और न ही नैफेड का. असहाय और मौन किसान, जिसके लिए यह सहकारी संस्था बनी, इसके शिकार बन रहे हैं. लेकिन कौन परवाह करता है?
सूत्रों के अनुसार नैफेड बोर्ड की अंतिम बैठक में बोर्ड उन शर्तों को मानने के लिए तैयार था, जिनसे सरकार को संगठन पर अत्यधिक नियंत्रण रखने का अधिकार प्राप्त हो सकता है. यदि प्रस्ताव स्वीकार हो जाते हैं तो सरकार यह भी सुनिश्चित करेगी कि नैफेड को किसी भी गैर-कोर गतिविधियों में लिप्त न होने दिया जाय, विशेषकर लापरवाह प्रकृति के व्यापारिक गठबन्धन.
सरकारी शर्तों की सूची में 51% इक्विटी का सरकार के पक्ष में हस्तांतरण का मामला शीर्ष पर है जब तक उचित पर्यवेक्षण और वित्तीय अनुशासन की दृष्टि से कृषि मंत्रालय को ऋण का भुगतान कर दिया जाता है.
अन्य शर्तों में नैफेड के बाइ-लॉ में बदलाव की बात शामिल है जिससे कि वह खुद को मुख्य कृषि संबंधी गतिविधियों तक सीमित रहे.
लेकिन अध्यक्ष की शक्ति में कटौती की बात ने मुद्दे को निपटने नहीं दी.
हालांकि विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार वर्तमान अध्यक्ष सहित बोर्ड के अधिकांश सदस्य इस बात पर सहमत थे लेकिन NCUI के अध्यक्ष और नैफेड के उपाध्यक्ष चन्द्रपाल सिंह ने असहमति व्यक्त की और अध्यक्ष के अधिकार को अक्षुण्ण रखना चाहा.
सरकार अपनी ओर से चुप्पी साधे हुए है. पूर्व प्रबंध निदेशक सी.ह्वी.आनंद बोस की बर्खास्तगी के मुद्दे पर अपनी अप्रसन्नता दिखाते हुए सरकार ने अपने पत्ते बन्द रखे हुए हैं. नए प्रबंध निदेशक संजीव चोपड़ा से संपर्क करने के प्रयास व्यर्थ साबित हुए क्योंकि वे प्रेस का सामना करने में झिझक रहे हैं.
इस बीच, सूत्रों के अनुसार, भ्रष्टाचार के मामलों में जांच जारी है जिसके लिए केन्द्रीय पंजीयक प्रत्येक अभियुक्त से व्यक्तिगत रूप से मिल रहे हैं जिससे कि सच्चाई का पता लग सके. पाठकों को ज्ञात होना चाहिए कि जांच समिति ने कुछ निदेशकों और नैफेड के 29 अधिकारियों को नोटिस भेजा है.
नैफेड के मामलों पर नजर रखने वालों को आशंका है कि अभियुक्त सारे आरोप स्व. अजित सिंह पर मढने का प्रयाश करेंगे जो स्वयं को बचाने के लिए जीवित नहीं है. जांच का एक सरल और प्रभावी तरीका यह हो सकता कि अभियुक्त की पूर्व और वर्तमान परिसंपत्तियों की तुलना की जाय. अगर संपत्ति में वृद्धि तर्कसंगत हो तो ठीक वरना उपयुक्त कारवार्ई शुरु कर देनी चाहिए.
नैफेड, जो कभी एक प्रतिष्ठित कृषि सहकारी संस्था थी, का इस स्तर तक पतन भारत में सहकारी आंदोलन के लिए चिंता का विषय. नैफेड का भविष्य अब क्या वास्तव में भगवान के हाथों है?
Posted on 16 September 2010 by ajayjha
बैंक ऑफ बड़ौदा (बॉब) ने मेमन सहकारी बैंक के अधिग्रहण का फैसला किया है. एक बयान में बड़ौदा बैंक ने कहा है कि वह मुंबई स्थित मेमन सहकारी बैंक, जो वर्तमान में कई परेशानियों का सामना कर रहा है, की चयनित संपत्ति और देनदारियों का अधिग्रहण करेगा.
बड़ौदा बैंक ने पहले से ही केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक का अनुमोदन प्राप्त कर लिया है. तथापि इस प्रयोजन के लिए, बैंक को कई अन्य औपचारिकताओं को पूरा करना है. उपयुक्त अधिकारियों को भी अधिग्रहण योजना को अनुमोदित करना होगा.
मई, 2009 में, बैंकिंग नियामक ने मेमन सहकारी बैंक के सभी कार्य निलंबित कर दिए थे.
कुप्रबंधन के कारण फर्म का नुकसान चरम स्तर पर चला गया है और नियामकों ने आरोप लगाया है कि वहाँ झूठे खातों की भरमार है.
हालांकि बैंक ने 2006, 2007 और 2009 के बैलेंस शीट में लाभ दिखाया था लेकिन वास्तव में इसी अवधि के दौरान इसे बहुत बड़ा नुकसान उठाना पडा था.
Posted on 16 September 2010 by ajayjha
भारतीय राष्ट्रीय सहकारिता संघ, सहकारिता का शीर्ष निकाय, अचानक सुर्खियों में आ गया है. कहा जाता है कि मार्च 2009 में इसके चुनाव में सहकारिता माफिया द्वारा धाँधली की गई थी. मामले की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए केन्द्रीय पंजीयक ने मामले की जांच करने के लिए मध्यस्थ नियुक्त किया है.
भारतीयसहकारिता.कॉंम से बातचीत करते हुए प्रसिद्ध सहकारिताकर्मी तपेश्वर सिंह के बेटे और स्वर्गीय अजीत सिंह के भाई श्री रणजीत सिंह ने कहा कि अधिशासी परिषद के चुनाव के लिए चुनाव क्षेत्र बनाने में कुछ उम्मीदवारों के पक्ष में हेरफेर किया गया था.
बहुराज्यीय समितियों का एक निर्वाचन क्षेत्र, आवास सहकारी समितियों का दूसरा और पर्यटन सहकारिता का तीसरा क्षेत्र बनता है. लेकिन कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों ने निर्वाचन क्षेत्रों मे कुछ ऐसा घाल-मेल कर दिया है कि एक क्षेत्र में दूसरे के सदस्यों का घुसपैठ संभव हो गया है. श्री रंजीत सिंह का दावा है कि ऐसा कुछ उम्मीदवारों के जीतने के अवसर में वृद्धि करने के लिए निर्वाचन अधिकारी की मिलीभगत से किया गया था. श्री सिंह का नामांकन इस प्रकार अवैध हेरफेर के कारण अस्वीकार कर दिया था.
अदालत जाने से पहले श्री सिंह ने केन्द्रीय रजिस्ट्रार के पास एक याचिका दाखिल की है जिसने श्री संजीव गुप्ता को मामले की जांच के लिए मध्यस्थ के रूप में नियुक्त किया है. केन्द्रीय रजिस्ट्रार से संपर्क करने का भारतीयसहकारिता.कॉम का प्रयास सफल नहीं हो सका.
पाठक जानते होंगे कि भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ (NCUI) जो भारतीय सहकारिता आंदोलन का शीर्ष संगठन है, सन् 1929 से कार्यरत है. भारतीय सहकारिता संघ के रूप में पुनः संगठित होने के बाद १९५४ में इसका नामकरण अखिल भारतीय सहकारी संघ के रूप किया गया और फिर 1961 में भारती राष्ट्रीय सहकारी संघ(NCUI) नाम पडा.
इसका उद्देश्य भारत में सहकारिता आन्दोलन को बढ़ावा देना और विकास करना है. यह लोगों को उनके सहकारीता क्षेत्र के निर्माण और प्रसार के प्रयाशों में शिक्षित, निदेशित और सहयता करना चाहता है तथा सहकारिता के सिध्दांतों के अनुरूप विचारों का प्रतिपादन करने में मदद देना चाहता है.
इस पृष्ठभूमि में यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि एक निकाय जिसका उद्देश्य सहकारिता आन्दोलन को मजबूत करना है, स्वयं ही विवाद में फंस जाता है. एनसीसीएफ के चुनाव में भारतीयसहकारिता.कॉम ने उजागर किया है कि कैसे निर्वाचन अधिकारी पूरी निर्वाचन प्रक्रिया का मजाक बना सकता है. रामहत नाम का एक उम्मीदवार नामांकन नहीं भर सका क्योंकि वहाँ उसके कागजात प्राप्त करने के लिए कोई नहीं था जबकि कुछ चुने हुए लोगों के कागजात एक अलग स्थान से लिए जा रहे थे.
यहां तक कि निर्वाचन अधिकारी की पसन्द एक मुद्दा है जिसका यदि ध्यान नहीं रखा गया तो सारा सहकारिता आन्दोलन ध्वस्त हो जाएगा. क्या सरकार इस पर ध्यान देगी?
Posted on 08 September 2010 by ajayjha
अध्यक्ष दिलीप केलकर ने उदारता का अनुरोध करने के लिए अहमदाबाद में भारतीय रिजर्व बैंक के अधिकारियों से मुलाकात की है. शुक्रवार को भारतीय रिजर्व बैंक ने इसका लाइसेंस रद्द कर दिया और सभी वित्तीय लेनदेन बंद करने का भी आदेश दिया.
केलकर का कहना है - “भारतीय रिजर्व बैंक का आदेश एक ऐसे समय में आया है जब बैंक का बोर्ड बैंक को पुनर्जीवित करने का गंभीर प्रयास कर रहा था. कुछ और समय मिलता तो हम अपनी सफलता दिखला देते”.
इसके पहले सारस्वत कोऑपरेटिव बैंक के साथ विलय करने का प्रयास विफल हो गया क्योंकि अपने कर्मचारी संघ वार्ता में बाधा उत्पन्न कर रहे थे.
अनन्य सहकारी बैंक न केवल भारत में बल्कि पूरे एशिया सबसे पुराना सहकारी बैंक है. इसका बंद होना भारतीय सहकारिता आंदोलन की एक बड़ी हार है. अंदरूनी सूत्रों के अनुसार कुछ निहित स्वार्थ वाले बोर्ड-सदस्यों ने सुनिश्चित किया है कि बैंक का पुनरुद्धार न हो .
भारतीय रिजर्व बैंक ने पुनरुद्धार के लिए उठाए जाने वाले ठोस कदम का प्रस्ताव प्रस्तुत करने के लिए अगस्त के अंत तक की समय सीमा निश्चित की है. उन्होंने कहा कि अंतिम झटका तब लगा जब बैंक के एक निजी कंपनी से वित्तीय सहायता प्राप्त करने के प्रयास को बोर्ड के सदस्यों के एक वर्ग से समर्थन नहीं मिला. सूत्रों ने यह भी आरोप लगाया कि बोर्ड के कुछ सदस्य जानबूझकर उस बैठक से अनुपस्थित रहे जिसमें कोष एकत्र करने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया जाना था.
भारतीय रिजर्व बैंक ने सितंबर 2007 में अनन्य बैंक को अपने गैर निष्पादक आस्तियों (एनपीए) को कम करने में सक्षम नहीं होने के कारण बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35 (ए) के तहत रखा था. एक उचित नेतृत्व मिलने पर 29,000 सदस्यों और 1 लाख से अधिक बैंक जमाकर्ताओं वाला बैंक वास्तव में पुनर्स्थापित हो सकता है.
Posted on 04 September 2010 by ajayjha
केरल के मुख्यमंत्री श्री व्ही.एस. अच्युतानंदन ने कहा है कि राज्य में सहकारी अस्पताल निजी क्षेत्र के अस्पतालों के समतुल्य हैं और निजी अस्पतालों द्वारा गरीब लोगों के शोषण को एक हद तक रोकने में मदद करते हैं.
अच्युतानंदन ने कहा कि एलडीएफ द्वारा स्थापित सहकारी अस्पतालों का उद्देश्य निजी क्षेत्र के अस्पतालों द्वारा गरीबों के शोषण को रोकना है. एलडीएफ के सत्ता में आने के बाद राज्य के स्वास्थ्य क्षेत्र में बडे बदलाव देखे गए हैं.
बदलाओं में से कुछ हैं – मेडिकल कॉलेजों में रेफर करने की प्रणाली स्थापित करना, चिकित्सा शिक्षकों का वेतन दोगुना करना और निजी प्रैक्टिस पर प्रतिबंध लगाना. लगभग ११५ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को राष्ट्रीय स्तर का बना दिया गया है, वी.एस. ने कहा.
Posted on 04 September 2010 by ajayjha
एक सराहनीय कदम उठाते हुए, केरल सरकार ने सहकारी बैंक के कर्मचारियों को पहले से ही प्राप्त पेंशन योजना का विस्तार डेयरी, फार्मिंग, कॉयर, मत्स्य पालन और उद्योगों जैसे सहकारी समितियों के अन्य क्षेत्रों में कार्यरत कर्मचारियों तक करने का निर्णय लिया है.
सहकारी क्षेत्र में कैरियर की स्थिति हमेशा से थोड़ा अस्थिर दिखाई पडती है और सरकार के इस कदम से इस क्षेत्र को निश्चित ही बढ़ावा मिलेगा. विभिन्न सहकारी संस्थाओं के लगभग बीस हजार कर्मचारियों को इस कदम से लाभ मिलने जा रहा है.
पेंशन राशि 600 रुपये प्रति माह से 10,000 रुपये प्रति माह तक है. 13 सितंबर को उस तारीख के रूप में निश्चित किया गया है जिस दिन केरल के मुख्यमंत्री श्री वी.एस. अच्युतानंदन इस परियोजना का अनावरण करेंगे.
Posted on 04 September 2010 by ajayjha
अनाजों के सड़ने से अंततः “गरीबों के मसीहा” कृषि मंत्री शरद पवार के समक्ष प्रश्न उत्पन्न हो गया है. मंगलवार ३१ अगस्त २०१० को देश के सर्वोच्च न्यायालय ने उनको इस समस्या के प्रति उदासीन दृष्टिकोण के लिए फटकारा.
पाठकों को याद होगा, 12 अगस्त को अदालत ने कहा था कि अगर सरकार अनाज सुरक्षित नहीं रख सकती तो इसे गरीब लोगों के बीच मुफ्त वितरित किया जाना चाहिए.
पवार ने कोर्ट के अवलोकन को हल्के लिया और कहा कि अदालत ने सिर्फ एक सुझाव दिया है और सरकार इस पर विचार करेगी.
३१ अगस्त को न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी और न्यायमूर्ति दीपक वर्मा की सुप्रीम कोर्ट बेंच ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल मोहन परासरन को कहा, “अपने मंत्री को ऐसी किसी भी टिप्पणी करने से बचने के लिए कहें.”
अदालत ने कहा: “यह हमारा आदेश है, एक सुझाव नहीं.”
अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया की वह बीपीएल, एपीएल और अन्त्योदय अन्न योजना के लाभार्थियों का नए सिरे से सर्वेक्षण करे. अदालत ने केंद्र सरकार के रियायती खाद्य योजनाओं के लाभार्थियों के आंकड़े पर कई राज्यों द्वारा असहमति व्यक्त करने के मद्देनजर यह आदेश पारित कर किया.
अदालत ने सरकार से कहा है कि वह सभी राज्यों में बड़े गोदामों का निर्माण सुनिश्चित करे. यह एक ऐसा काम है जिस पर एन.सी.सी.एफ की नजर है.