Posted on 18 April 2013 by dipakkumar
तमिलनाडु में वर्तमान में चल रही सहकारी चुनावों में हिंसा के कम होने का कोई संकेत नहीं दिखता है।
एक बार फिर से राज्य के रामनाथपुरम जिले से हिंसक घटना की रिपोर्ट मिली है।
पुलिस ने बताया कि जिले के एक गांव में पैक्स के चुनाव में कांग्रेस और एआईएडीएमके के सदस्यों के बीच संघर्ष में बीस लोग घायल हो गए हैं।
दो पार्टियों के सदस्यों के बीच अपमानजनक टिप्पणियों के बाद यह घटना घटी, पुलिस ने कहा।
Posted on 23 July 2012 by dipakkumar
रंजन सिंह का कहना है कि वह बिहार में दैनिक भास्कर का प्रमुख संवाददाता है। उसने भारतीय सहकारिता को लिखे पत्र में समस्तीपुर में धान की खरीद में सहकारी अधिकारियों के ज़ुल्म को उजागर किया है।
हम पत्र को नीचे प्रस्तुत कर रहे है,
महोदय,
समस्तीपुर जिले के कल्याणपुर प्रखंड में ध्रुवगामा नाम का गांव है, किसानों को खुले तौर पर प्राथमिक कृषि सहकारी सोसायटी द्वारा केवल 1225 रुपये प्रति हजार किलो गेहूं का भुगतान किया गया, जबकि सरकारी दर 1260 रुपये है।
किसानों को अपने बोरे लाने को कहा जाता है जिससे पैक्स अधिकारियों समय पर लौटने का वादा करते है। यह कहानी जिले के हर गांवों में एक सी ही है, वहाँ कोई आधिकारिक तौर पर आपको सुनने के लिए तैयार नही होता है। यहाँ सहकारी समितियों में भ्रष्टाचार व्याप्त है, हमेशा जब भी कोई सहकारी बैंक से ऋण लेता है, उससे सबसे पहले घूस की मांग की जाती है।
मैंने सहकारी अधिकारी राम नरेश पांडे को फोन किया लेकिन उन्होने लिखित शिकायत की मांगकर बात को खारिज कर दिया। जब मैंने उनसे रजिस्ट्रार का फोन नंबर पूछा तो उनके पास कोई नंबर नही था।
मैं आप जैसे लोगों की की मदद से किसानों को 1260 रुपये गेहूं की प्रति हजार किलोग्राम मिले इसके लिेए राष्ट्रीय स्तर पर उच्च अधिकारियों से मैं अनुरोध करता हूँ। बिहार सरकार कुछ नहीं कर रही है।
रंजन
चीफ रिपोर्टर
दैनिक भास्कर
ई मेल-ranjan.blu@gmail.com
Posted on 22 July 2012 by parasnath
आधिकारिक सूत्रों का दावा है कि उड़ीसा में धान की खरीद वर्ष 2011-12 में एक बड़ी सफलता रही है और इसमें प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों (पैक्स) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
कुल 42.38 लाख मीट्रिक टन धान की अब तक की खरीद में, पैक्स के 37.30 लाख मीट्रिक टन पूरी खरीद का सबसे बड़ा हिस्सा है।
राज्य में पैक्स की संख्या 1,858 है और पैक्स ने दो हजार से अधिक खरीद केन्द्र खोले गए थे। मार्कफेड, नाफेड, टीडीसीसी और एफसीआई ने भी अनाज खरीद में भाग लिया।
सूत्रों के मुताबिक, यह मुख्य रूप से सहकारी समितियों का प्रयास है कि राज्य में सफल धान की खरीद हो सकी है।
Posted on 19 June 2012 by parasnath
बिहार में एक सहकारी अधिकारी रंगे हाथों पकड़ा गया है, उसे लक्षीसराई में अपने दफ्तर में ही घूस लेते पकड़ा गया है। यह कार्रवाई स्थानीय प्राथमिक कृषि साख सहकारी समिति द्वारा दर्ज कराई शिकायत पर की गई।
अभियुक्त सरकारी अधिकारी गेहूं की खरीद की अनुमति देने के लिए रिश्वत ले रहा था।
आरोप है कि इससे पहले भी उसने पैक्स के अध्यक्ष से कुछ राशि घूस के रुप में ली थी।
बिहार में अनाज खरीद को लेकर सहकारी अधिकारियों के बीच बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार है। यहाँ नौकरशाही बिल्कुल ईमानदार नहीं है और वह सामान्य अनाज की खरीद के साथ हस्तक्षेप करती रहती है।
Posted on 28 May 2012 by ajayjha
बिहार में सहकारी निकायों के निदेशकों के बीच लड़ाई के कारण सहकारी क्षेत्र युद्ध क्षेत्र में बदल गया है। 23 मई का सम्मेलन पूर्व बिस्कोमॉन अध्यक्ष सुनील सिंह द्वारा आयोजित किया गया था, जिसके बाद राज्य द्वारा सहकारी सम्मेलन 26 मई को प्रायोजित किया गया।
सुनील सिंह से आतंकित सरकार ने श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल का उपयोग करने के लिए भले ही अनुमति नहीं दी बावजूद इसके सहकारी नेताओं की संख्या हजारों में थी, सुनील सिंह ने भारतीय सहकारिता डॉट कॉम से बात करते हुए कहा।
सुनील सिंह के कार्यक्रम में कई शीर्ष नेताओं सहित एनसीयुआई अध्यक्ष चन्द्रपाल सिंह यादव ने भाग लिया। सरकार द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम का उद्देश्य महिलाओं को सहकारिता के प्रति जागरुक करना और उन्हें इस क्षेत्र में सक्रिय बनाना था।
सुनील सिंह के मुताबिक राज्य में सहकारिता क्षेत्र में महिला कार्यकर्ताओं के अभाव में भाजपा महिलाओं को उतारा गया था। सहकारी अधिकारियों ने प्रत्येक जिले में चेतावनी दी थी और भाजपा महिला सेल से संपर्क करने के लिए स्वयंसेवकों को भेजने के लिए कहा था। राज्य में केवल 264 महिलाएँ पैक्स अध्यक्ष हैं, उन्होंने कहा।
उन्होंने यह भी कहा कि पैक्स में 8500 पुरुष अध्यक्ष को आमंत्रित नहीं किया था।
सुनील सिंह के विरोधियों ने उन पर दोहरे मापदंड का आरोप लगाया है। वे अपने राजनीतिक स्वार्थों के कारण पैक्स अध्यक्ष की ओर से बात कर रहे है, उनका तर्क है।
उनमें चुनाव लड़ने का साहस नहीं है और बिहार में चुनाव हाल ही मे प्राधिकरण के तहत नई प्रणाली के माध्यम से किया गया है तो वे उनकी ओर से कैसे बात कर सकते हैं? वह एक ऐसे सहकारी नेता है जो पारदर्शिता से डरते है और वे अब मात्र एक कागजी शेर बनकर रह गए है, लोगों का कहना है।
Posted on 25 April 2012 by ajayjha
ममता बनर्जी की पश्चिम बंगाल की सरकार से एक अच्छी खबर है। राज्य सरकार, नीतीश कुमार की तर्ज पर सहकारी क्षेत्र में आपराधिक प्रवृत्तियों और अलोकतांत्रिक मानदंडों को खत्म करना चाह रही है।
इस उद्देश्य के लिए ममता सरकार ने सहकारी क्षेत्र के लिए एक समर्पित निर्वाचन आयोग का गठन किया है, यह सहकारी क्षेत्र के पुनर्गठन की दिशा में एक बड़ा कदम है।
पाठकों को याद होगा कि नीतीश ने 2008 में बिहार के अंदर प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियों के निष्पक्ष चुनाव के लिए चुनाव प्राधिकरण की स्थापना की थी। यह पैक्स(PACS) के सभी ग्रामीण केंद्रित योजनाओं में असरदार साबित हुआ है।
पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग जल्द ही एक हजार से अधिक प्राथमिक सहकारी समितियों के प्रबंध निकायों के लिए चुनाव आयोजित करेगा।
पश्चिम बंगाल में हजारों पंजीकृत सहकारी समितियाँ हैं, इसके अलावा लगभग पांच हजार से अधिक प्राथमिक कृषि समितियां और बीस से अधिक जिला केंद्रीय सहकारी बैंक हैं।
सूत्रों का कहना है कि राज्य में सहकारी संस्थाओं में से अधिकांश अभी भी वर्तमान कम्युनिस्टों द्वारा अलोकतांत्रकीय तरीके से प्रबंधित हो रहे है, उन्हें ममता सरकार द्वारा बाहर निकाला जा रहा है।
Posted on 29 March 2012 by ajayjha
सहकारी बैंकों की भूमिका बिहार की आर्थिक परिवर्तन के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जाता है। राज्य विधानसभा में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए, बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने कहा, सरकार खुद कोई बैंक सेवा प्रारंभ नही करेगी लेकिन राज्य में सहकारी बैंकों को मजबूत बनाने के लिए सभी संभव कदम उठाएगी।
मोदी के अनुसार, सहकारी बैंक बड़े पैमाने पर लोगों की वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करती है इसलिए इनके कामकाज को प्रभावी बनाने के प्रयास करने होंगे।
पर्यवेक्षकों के अनुसार, नीतीश की सरकार सहकारी आंदोलन को महत्वपूर्ण मानती है और राज्य भर में सहकारी नेटवर्क का विकास उसकी योजना में एक प्राथमिकता है, यह बिहार ही था जहां चुनाव प्राधिकरण के जरिए राज्य भर में प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों के चुनाव का संचालन हुआ था।
यह प्रयोग एक बड़ी सफलता है, आज राज्य के दूरस्थ भागों में यह फैला है और इसके माध्यम से धान खरीद के लिए ऋण भुगतान के जरिए विभिन्न सरकारी योजनाओं को लागू किया जा रहा है, बिहार मे PACS के नेटवर्क का विकास एक बडी सफलता है, नीतीश कुमार को वास्तव मे सहकार रत्न उपाधि से सम्मानित किया जाना चाहिए।
Posted on 06 December 2011 by ajayjha
शनिवार को बिहार कैबिनेट ने धान की खरीद के लिए राज्य में सहकारी बैंकों के लिए 800 करोड़ रुपये के ऋण को मंजूरी दी है. . Indiancooperative.com ने रेपोर्ट किया था कि राज्य सरकार ने राज्य में प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों के लिए एक बड़ी भूमिका का अदा करने का फैसला किया है.
उप मुख्यमंत्री एस मोदी धान की खरीद और सार्वजनिक वितरण की छत्तीसगढ़ की मौजूदा प्रणाली का अनुसरण करना चाहते हैं और कहा कि उनकी सरकार ने भी राज्य में इसी तरह की प्रणाली को लागू करने का फैसला किया है.
Posted on 13 November 2011 by ajayjha
NCUI के अध्यक्ष चन्द्र पाल सिंह यादव ने जोर दिया कि प्रति नागरिक प्रति दिन 32 रुपये के योजना आयोग की सीमा को धराशायी करने में सहकारिता सक्षम है. उन्होंने जोर देकर कहा है कि सहकारी समितियां अपने प्रत्येक सदस्य की आमदनी प्रतिदिन 200/- रुपये तक बढ़ सकती है. उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि सहकारी समितियों पर अधिक ध्यान केंद्रित करे.
शुक्रवार को दिल्ली में भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ द्वारा आयोजित 58वां अखिल भारतीय सहकारी सप्ताह की पूर्व संध्या पर बोलते हुए श्री यादव ने कहा की पंच वर्षीय योजना में सहकारी समितियों पर एक शब्द भी नहीं कहा जाता है हालांकि हमारी सदस्य संख्या लगभग 23 करोड़ है.
देश में 6 लाख गांव हैं और एक लाख PACs (प्राथमिक कृषि सहकारी सोसायटी) है. सहकारी समितियां आसानी से गांव में आखिरी आदमी तक पहुंच सकती हैं, उन्होंने कहा. लेकिन जब हम पूरे बजट भाषण में सहकारी समितियों पर एक शब्द भी नहीं सुनते हैं तो हमें दुख होता है, उन्होंने कहा.
सहकारी समितियों में भ्रष्टाचार पर उठाए एक सवाल पर अध्यक्ष ने उसके बुरे प्रभाव को स्वीकार किया और कहा कि हम इसका विरोध करते हैं और जांच एजेंसियों के काम का स्वागत करेंगे. पाठकों को याद होगा कि नैफेड घोटाले ने पूरे सहकारी जगत का सिर चकरा दिया था.
उन्होंने कहा कि पेशेवर तर्ज पर काम करने के लिए सहकारी मानव संसाधन विकास को मजबूत बनाना आवश्यक है. एशिया में भारत के पास सहकारी क्षेत्र में मानव संसाधन विकास संस्थानों का सबसे बड़ा नेटवर्क है, लेकिन मौजूदा बुनियादी ढांचे और फंड की उपलब्धता अपर्याप्त हैं.
Posted on 27 October 2011 by ajayjha
स्वर्गीय तपेश्वर सिंह के पुत्र रणजीत सिंह सहित विभिन्न सहकारी नेताओं ने मांग की है कि राज्य आधारित सहकारी समितियों के बोर्ड के चुनाव जल्द कराएं जांए, जिनका हाल ही में अधिक्रमण किया गया है.
पाठकों को याद होगा कि राज्य सरकार ने सोमवार को Biscomaun सहित कई कई सहकारी संघों के बोर्ड अधिक्रमण किया. इसने 14 जिला सहकारी बैंकों और राज्य भर के लगभग 300 व्यापार मंडलों के बोर्ड का अधिक्रमण किया.
Buxer से पीएसीएस के अध्यक्ष रणजीत सिंह ने शनिवार को पटना में एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि कुछ लोग पांच साल का समय समाप्त होने की बाद भी पद पर बने रहना चाहते हैं. सहकारी समितियों के काम में पारदर्शिता अवश्य होनी चाहिए. सहकारी नेता जो अपने कार्यकाल पूरा कर चुके हैं वे पीएसीएस की तर्ज पर लोकतांत्रिक चुनाव के लिए रास्ता बना दें, उन्होंने कहा.
सहकारी आंदोलन को मजबूत बनाने में अपने पिता तपेश्वर सिंह की भूमिका की सराहना करते हुए श्री रणजीत सिंह ने कहा कि वह 30 साल तक साइकिल पर दौरा करते रहे और संस्थानों को बनवाया. कुछ लोग गलत प्रथाओं में लिप्त होकर उन संस्थानों को नष्ट करना चाहते हैं.