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97वें सीएए पर महाराष्ट्र में लेजिस्लेटिव अव्यवस्था की भरमार

Posted on 29 April 2013 by ajayjha

गैर सहायता प्राप्त सहकारी समितियों के मामलों में संसद की निर्णायक दिशाओं को देखते हुए महाराष्ट्र ने विधायी अव्यवस्था के विरुद्ध युद्ध स्तर पर हस्तक्षेप किया है।

ऐसा लगता है जल्दबाजी में महाराष्ट्र राज्य आयुक्त और सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार द्वारा महाराष्ट्र में सहकारी समितियों के सभी संभागीय और जिला उपपंजीयकों को 22-02-2013 को सलाह जारी की गई है।

ऐसा लगता है कि आयुक्त श्री मधुकर चौधरी (आईएएस) के द्वारा 15-02-2013 को सरकार की तरफ से पत्र के रुप में सलाह जारी की गई है।

रजिस्ट्रार द्वारा 14-02-2013 को जारी महाराष्ट्र सहकारी (संशोधन) अध्यादेश 2013 के तहत एमसीएस अधिनियम 1960 के संशोधित धारा 14 के तहत उपनियम कानून में संशोधन करने के लिए सहकारी समितियों को निर्देशित करने का अधिकार दिया गया है।

यह सलाह धारा 14 के तहत नही है। यह नए उपनियम को अपनाने के लिए संबंधित वार्ड अधिकारियों के माध्यम से सभी सहकारी समितियों पर दबाव बनाने के लिए एक आंतरिक अनुदेश है।

वेबसाइट www.societywiki.com पर रिपोर्ट को के-पश्चिम वार्ड में सभी सहकारी आवास समितियों के उपपंजीयक, सहकारी समितियां, के-पश्चिम वार्ड, मुंबई द्वारा नई उपनियम को अपनाने के लिए 31.5.2013 तक का ही समय दिया गया है।

सहकारी सोसायटी के पंजीयक द्वारा अनुमोदित संशोधित उपनियम को 30.04.2013 पर या इससे पहले मौजूदा उपनियम के स्थान पर अपनाये जाने की जरुरत हैं जिसके लिए एक विशेष आम सभा की बैठक बुलाने की जरूरत है। इस तरह की विशेष आम सभा की बैठक के लिए एजेंडा मॉडल उपनियम कानून को अपनाने के लिए किया जाएगा।

वर्ष 2012-2013 के लिए सोसायटी की पुस्तकों के ऑडिट के लिए एक लेखा परीक्षक और उसके पारिश्रमिक को फिक्स करने के लिए यह जरुरी है कि लेखा परीक्षक सरकार विभाग द्वारा बनाए पैनल में से एक होना चाहिए।

एक लेखा परीक्षक अधिक से अधिक तीन साल के लिए लगातार एक ही सोसाइटी के खातों को ऑडिट नहीं कर सकते हैं। इसके अलावा कोई भी लेखा परीक्षक एक वर्ष में 20 से अधिक समितियों के ऑडिट का संचालन नही कर सकते हैं। हालांकि, इस उद्देश्य के लिए समितियों की संख्या की गणना में 1 लाख रुपए से भी कम शेयर पूंजी वाले सोसायटी शामिल नहीं किये जायेंगे।

31.05.2013 से पहले मॉडल उपनियम को अपनाने के लिए प्रस्ताव दाखिल करना आवश्यक है।

यदि प्रबंध समिति का कार्यकाल समाप्त हो गया है या अगले छह महीने के भीतर समाप्त हो रहा है वहां सोसायटी को तुरंत ऊपर दिए गए निर्देशों का पालन करना चाहिए।

इन निर्देशों को उप पंजीयक देने में k-वेस्ट, नई धारा 77I (2) एमसीएस अधिनियम 1960 की धारा 77A कि अनदेखी की गई है, जिन समितियों के शर्तों की अवधि समाप्त हो गई हो, कानूनी तौर पर ऐसे सदस्य तत्संबंधी समिति के पदाधिकारी नहीं रह सकते हैं। एक साधारण सदस्य द्वारा बुलाई गई विशेष आम सभा की बैठक कानूनी बैठक के रूप में स्वीकार कर ली जाएगी या नही इस पर कोई विचार नही किया गया है।

ऐसे परामर्श 97वें संवैधानिक संशोधन के उद्देश्यों को पूरा करने में कहाँ तक सहायक होते है?

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एमएससीएस 2002 संशोधन पर पुनर्विचार: पैनल की माँग

Posted on 27 December 2012 by ajayjha

बासुदेव आचार्य की अध्यक्षता में संसदीय पैनल ने बहु राज्य सहकारी बिल (एमएससीएस 2002) में प्रस्तावित संशोधन पर कठोर पुनर्विचार करने की माँग की है।

पैनल की रिपोर्ट संसद में पेश की गई है।

पाठकों को याद होगा कि भारतीय सहकारिता ने इस मुद्दे पर कई सहकारी नेताओं की बड़े पैमाने पर प्रतिक्रियाएँ ली थी। एनसीयुआई, इफको और अन्य सहकारी
संस्थाओं ने पैनल से मुलाकात की और इस पर अपने विचार पेश किए थे।

पैनल के अनुसार संशोधित बिल सभी प्रकार के अंतर्विरोधों से भरा है। इसमें बहुराज्य सहकारी सोसायटी (संशोधन) विधेयक 2010 और ‘संविधान 111वें संशोधन विधेयक 2009 के प्रस्तावित खंड के बीच कुछ स्पष्ट मतभेद दिखाई पड़ते है।

पैनल ने बिल को कृषि मंत्रालय को भेजा और इसे कानून मंत्रालय के साथ पूरी तरह से परामर्श करके संविधान के अनुरुप बनाने को कहा है। पैनल ने सभी
हितधारकों के हितों को ध्यान में रखकर नये बिल को संसद में पेश करने की राय दी है।

हालांकि पैनल ने परीक्षण के प्रारंभिक चरणों के दौरान सुझाव दिया था कि मंत्रालय को मौजूदा बिल वापस ले लेना चाहिए और ‘संविधान 111वें संशोधन विधेयक, 2009 के सहकारी क्षेत्र में लागू होने के बाद एक नया बिल लेकर आना चाहिए। लेकिन सरकार ने प्रस्तावित विधेयक को बिल्कुल ठीक ठाक कहकर इस “त्रुटिपूर्ण” दृश्य के साथ ही इसे रहने दिया।

पैनल प्रस्तावित विधेयक की जांच फिर से शुरू तब की जब मंत्रालय द्वारा उससे सूचित किया कि संविधान 111वें संशोधन विधेयक को इस साल की शुरुआत में लागू किया गया था।
पैनल ने कहा कि कृषि मंत्रालय ने अपनी गलती का एहसास होने के बाद समिति ने प्रस्तावित बिल और संविधान के अनुच्छेद 243 ज़ेड एल के खंड 41ए के बीच विरोधाभास की ओर इशारा किया।

पैनल के अनुसार यह समझ से परे है कि एक निर्वाचित बोर्ड एक ‘निष्क्रिय स्थिति में सरकार द्वारा बनाए गए एक पेशेवर बोर्ड सरकार द्वारा आरोपित इस बोर्ड को कैसे अनदेखी कर दिया गया।

पैनल ने यह भी कहा कि कानून मंत्रालय ने बिल को त्रुटिपूर्ण पाया और पूरी तरह से फिर से इस पर विचार करने का सुझाव दिया।

सूत्रों का कहना है कि विधेयक में परिवर्तन सहकारी समितियों के प्रबंधन के सदस्यों को जिम्मेदार और अंतरिम बोर्ड के गठन के लिए उपलब्ध कराने के साथ लेखा मानकों, बहुराज्य सहकारी समितियों और विशेष लेखा परीक्षा के केंद्रीय रजिस्ट्रार द्वारा जानकारी या स्पष्टीकरण के लिए जवाबदेह बनाना चाहते हैं।

बिल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं के लिए भी बहु राज्य सहकारी समितियों और बोर्ड के सदस्यों के चुनाव के लिए आरक्षण उपलब्ध कराता है।

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मध्यप्रदेश: सहकारी अधिनियम में संशोधन

Posted on 03 December 2012 by ajayjha

मध्यप्रदेश सरकार राज्य में सहकारी क्षेत्र के लिए एक स्वतंत्र चुनाव एजेंसी उपलब्ध कराने के लिए विधानसभा के आगामी सत्र में एक संशोधन विधेयक रखेगी।

संशोधन में सहकारिता को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देना शामिल है।

पिछले साल दिसंबर में देश की संसद  ने  इस संबंध में एक संवैधानिक संशोधन पारित किया था। केंद्र ने राज्य सरकारों से कहा था कि फ़रवरी 2013 से पहले अपने सहकारी अधिनियम में आवश्यक परिवर्तन के बारे में विचार कर लें।

केन्द्रीय सरकार द्वारा सहकारी अधिनियम में संशोधन उन राज्यों में यह स्वतः अस्तित्व में आ जाएगा, जहाँ फरवरी 2013 तक सहकारी अधिनियम में संशोधन नही किया गया है।

हालांकि, संशोधित अधिनियम का आनेवाले सहकारी चुनावों पर कोई असर नहीं होगा।

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सहकारी अधिकारी की हत्या की संसद में गूंज

Posted on 23 May 2012 by parasnath

कर्नाटक के ऑडिटर एस पी महन्तेश की क्रूर हत्या ने देश की संसद को हिलाकर रख दिया है। एक सीपीएम सदस्य ने यह मुद्दा ऊपरी सदन में उठाया। संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि अधिकारी की हत्या का संबंध रक्षा मंत्रालय के विवादास्पद टेट्रा ट्रक सौदे के साथ भी  हो सकता है।

इस रहस्योद्घटन से श्री महन्तेश की हत्या में एक नया आयाम जुड़ गया है।

श्री महन्तेश बीईएमएल के लिए भूमि आवंटन पर रिपोर्ट की प्रति सार्वजनिक कर दी थी। यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि बीईएमएल कंपनी के माध्यम से चेक निर्माता भारत को टेट्रा ट्रक की आपूर्ति करती है।

संसद के ऊपरी सदन में सदस्यों में इस बात पर खासी नाराजगी थी कि कर्नाटक सरकार पिछले दिनों राज्य में आरटीआई कार्यकर्ताओं और भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने वालों के जीवन की रक्षा करने में बिल्कुल विफल रही है।

 

 

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नाबार्ड नक्सली चुनौती का सामना करने को तैयार

Posted on 22 May 2012 by parasnath

सरकार ने संसद को सूचित किया है कि अति वामपंतवाद से प्रभावित क्षेत्रों में नाबार्ड कई नई शाखाओं की स्थापना करेगा।

नाबार्ड द्वारा उन सभी क्षेत्रों को कवर किया जाएगा जहाँ महिलाओं के स्वयं सहायता समूह कार्यरत है।

केंद्रीय वित्त मंत्री के अनुसार, नाबार्ड अधिक से अधिक चार सौ डीडीएम कार्यालय होंगे जो पूरे देश में 510 जिलों को कवर करेगा।

सूत्रों का कहना है कि नएडीडीएम कार्यालयों की अधिकांश इकाईयाँ देश के सीमांतीय राज्यों में खोला जाएगा।

 

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सहकारिता को डेयरी मोर्चे पर अद्भुत सफलता: पवार

Posted on 14 December 2011 by ajayjha

मंगलवार को केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने संसद में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में कहा कि देश ने दूध उत्पादन में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है और सहकारी समितियों ने इसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
भारत में दूध उत्पादन की वार्षिक वृद्धि दर पिछले एक दशक के दौरान मानव आबादी की औसत वार्षिक वृद्धि की तुलना में अधिक है, संसद को मंत्री द्वारा सूचित किया गया.
देश में वर्ष 2010-11 के दौरान 116.20 लाख टन दूध का उत्पादन का अनुमान था, उन्होंने कहा. भारत दुनिया में दूध का सबसे बड़ा उत्पादक साथ ही सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है.

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