
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय विधेयक, 2025 के राज्यसभा में पारित होने को गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने सहकारिता क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक दिन बताया।
उन्होंने एक्स प्लेटफॉर्म पर पोस्ट करते हुए लिखा, “आज का दिन देश के सहकारी क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक है। मोदी जी के विजनरी नेतृत्व में ‘त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय विधेयक, 2025’ लोकसभा के बाद राज्यसभा में भी पारित हो गया। सहकार, नवाचार और रोजगार की त्रिवेणी लाने वाले इस महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए मैं सभी सांसदों को बधाई देता हूँ।”
उन्होंने आगे कहा कि यह विश्वविद्यालय सहकारी शिक्षा को भारतीय शिक्षा प्रणाली का अभिन्न अंग बनाएगा और प्रशिक्षित युवाओं के माध्यम से सहकारी क्षेत्र को अधिक संगठित, सुव्यवस्थित और आधुनिक युग के अनुरूप बनाया जाएगा। उन्होंने सहकारिता क्षेत्र से जुड़े सभी लोगों की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार व्यक्त किया।
राज्यसभा में चर्चा का जवाब देते हुए केंद्रीय सहकारिता राज्य मंत्री मुरलीधर मोहोल ने कहा कि सहकारी क्षेत्र के विस्तार और इसे गतिशील बनाने के लिए संस्थागत व्यवस्था आवश्यक थी। इसी उद्देश्य से त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय की स्थापना की जा रही है।
उन्होंने बताया कि कई सहकारी संस्थानों में प्रबंधन की अनियमितताएँ, कार्य क्षमता की कमी और तकनीकी संसाधनों का सीमित उपयोग जैसी चुनौतियाँ हैं, जिससे उनका प्रदर्शन प्रभावित हो रहा है। इस विश्वविद्यालय के माध्यम से सहकारिता क्षेत्र का दायरा और प्रभाव निश्चित रूप से बढ़ेगा, जिससे नए स्वरोजगार और नवाचार के अवसर सृजित होंगे।
मुरलीधर मोहोल ने कहा कि पैक्स के सचिव से लेकर एपेक्स बैंक के एमडी तक सभी स्तरों पर प्रशिक्षित और कुशल मानव संसाधन की आवश्यकता है। एक अनुमान के अनुसार, आने वाले 5 वर्षों में सहकारिता क्षेत्र को लगभग 17 लाख प्रशिक्षित युवाओं की जरूरत होगी।
वर्तमान में सहकारी शिक्षा और प्रशिक्षण की व्यवस्था बिखरी हुई है, जिससे इस क्षेत्र की कार्यकुशलता पर असर पड़ता है। इसी को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन में त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय की स्थापना का निर्णय लिया गया।
यह विश्वविद्यालय सहकारी क्षेत्र में कुशल मानव संसाधन तैयार करेगा, जिससे युवाओं को इस क्षेत्र में करियर के नए अवसर मिलेंगे और सहकारिता की भावना को बढ़ावा मिलेगा। इससे भारत में सहकारिता आंदोलन को नई ऊर्जा मिलेगी और यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।